सिंधु घाटी की सभ्यता तथा इसकी मुख्य विशेषताएं

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सिंधु घाटी की सभ्यता तथा इसकी मुख्य विशेषताएं

Indus Valley Civilization in Hindi-
सिंधु सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक है| नदी घाटी सभ्यताओं के अंतर्गत जिस प्रकार मेसोपोटामिया, मिस्र तथा चीन की सभ्यताओं का विकास हुआ, उसी तरह सिंधु नदी की घाटी में सिंधु घाटी सभ्यता का विकास हुआ| सिंधु घाटी की सभ्यता भारत में अब तक ज्ञात सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता है| वर्तमान भारतीय संस्कृत की महत्वपूर्ण बातें आधुनिक भारतीय धर्म व संस्कृति में दिखाई देती है| भारतीय संस्कृति में देवी पूजा का प्रचलन सिंधु घाटी की मातृदेवी की उपासना का ही एक रूप है|
सिंधु नदी की घाटी सभ्यता में इस सभ्यता का जन्म होने के कारण इसे सिंधु घाटी की सभ्यता अथवा सैंधव सभ्यता भी कहते हैं| सिंधु सभ्यता हड़प्पा नामक स्थान पर प्राप्त हुई है इस वजह से इसका नाम हड़प्पा सभ्यता (Harappan Civilization) भी है| इस सभ्यता का प्रमुख नगर हड़प्पा था यह सभ्यता लगभग 2500 ई. पू. विकसित हुई थी|

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज-

इस सभ्यता का आभास सर्वप्रथम 19वी शताब्दी में पुरातत्ववेत्ता कनिंघम को हुआ| इसके बाद वर्ष 1921 में सर जॉन मार्शल की अध्यक्षता में माधव स्वरूप वत्स और दयाराम साहनी ने पंजाब प्रांत में स्थित मोंटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर स्थित हड़प्पा के टीले का उत्खनन किया| राखल दास बनर्जी ने वर्ष 1922 में मोहनजोदड़ो नामक स्थान पर खुदाई कराई| इस खुदाई में नगरों के भवन तथा अन्य अवशेष प्राप्त हुए, जिनसे यह पता चलता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग सभ्य एवं शांति पूर्वक जीवन व्यतीत करते थे|

हड़प्पा सभ्यता के जानने के स्रोत

सिंधु सभ्यता के दो प्रमुख नगरों के नाम हड़प्पा और मोहनजोदड़ो थे| इन स्थलों की खुदाई से अनेक अवशेष प्राप्त हुए हैं; जैसे- मकान, नालियां, कुआं, बर्तन, मूर्तियां, वस्त्र, आभूषण, आदि| इन अवशेषों से उस समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक जीवन पर प्रकाश डाला जा सकता है|

सिंधु घाटी सभ्यता की मुख्य विशेषताएं-

सिंधु घाटी सभ्यता का सामाजिक जीवन

हड़प्पा सभ्यता के सामाजिक जीवन की विशेषताएं निम्नलिखित थी

समाज- हड़प्पा सभ्यता में परिवार, समाज की मूल इकाई था और परिवार मातृ सत्तात्मक होते थे। व्यवसाय के आधार पर समाज को चार श्रेणियों में बांटा गया था- विद्वान वर्ग, प्रशासनिक अधिकारी, व्यावसायिक वर्ग तथा श्रमजीवी वर्ग| विद्वान वर्ग के लोगों में पुरोहित, वैध, ज्योतिष आदि व्यक्तियों को रखा जाता था| इस सभ्यता के लोगों के आवासों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि समाज में आर्थिक विषमता व्याप्त थी| धनी लोग बड़े-बड़े मकानों में रहते थे जबकि निर्धनों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बसेरा करना पड़ता था| सिंधु सभ्यता में जिस तरह से सुनियोजित नगर, एकरूप लिपि मौजूद थी इससे यह पता चलता है कि इस सभ्यता में एक राजनीतिक सत्ता अस्तित्व में थी|

खानपान- हड़प्पा वासियों द्वारा शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन प्रयोग किया जाता था इस सभ्यता के लोग अपने खाने में गेहूं चावल के साथ साथ कई फलों एवं दूध दही का भी प्रयोग करते थे| मांसाहारी खाने में लोग भेड़, बकरी मछली, सूअर ,तथा मुर्गे आदि का मांस खाते थे।

वेशभूषा-इस सभ्यता में प्राप्त अवशेषों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय के निवासी सूती व उन्हें कपड़ा बनाते थे एवं उनका उपयोग करते थे| पुरुषों का मुख्य पहनावा धोती हुआ करती थी और स्त्रियों का प्रमुख वस्त्र घाघरा हुआ करता था| पुरुषों की तुलना में स्त्रियां साज सज्जा में अधिक ध्यान देती थी|

आभूषण- इस सभ्यता में स्त्रियां एवं पुरुष दोनों ही आभूषण पहनते थे| उस समय के धनी वर्ग के लोग सोने एवं चांदी के बने आभूषणों का प्रयोग करते थे जबकि निर्धन लोग तांबे व हड्डियों से बने आभूषणों का प्रयोग करते थे|

श्रृंगार- सिंधु सभ्यता में स्त्रियां एवं पुरुष दोनों ही श्रृंगारप्रिय थे। स्त्रियां सुगंधित तेल ,सुरमा ,सुर्खी, और हाथी दांत से बनी कंघी ,का प्रयोग करती थी और बालों को विभिन्न प्रकार से सॅवारती थी। पुरुष भी अपने बाल एवं मूछें आदि को संवारने पर विशेष ध्यान देते थे।

मनोरंजन के साधन– मनोरंजन के साधनों में शिकार करना, मछली पकड़ना, पशु पक्षियों को आपस में लड़वाना, चौपड़ और पासा खेलना आदि प्रमुख थे| मिट्टी के बने कई प्रकार के आसन के खिलौने इस सभ्यता की खुदाई से प्राप्त हुए हैं| नर्तक एवं नर्तकी की मूर्ति को देखने से नृत्य के प्रति लोगों की रुचि का ज्ञान होता है| खुदाई से प्राप्त मुहरों से पता चलता है कि उस समय जुआ खेलने का चलन था। बच्चों के खेलने के लिए पत्थर, हाथीदांत, मिट्टी, तांबे ,से बने खिलौने सीटियां ,बैलगाड़ियां ,इत्यादि का चलन था।

स्त्रियों की दशा- इस सभ्यता में स्त्रियों की दशा बहुत ही उच्च थी और उन्हें सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। धार्मिक व सामाजिक उत्सव तथा त्यौहारों में भाग लेती थी। स्त्रियों का प्रमुख कार्य गृहस्थ कार्यों को करना था, इस सभ्यता में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था।

चिकित्सा प्रणाली- सभ्यता के लोगों को रोगों के बारे में जानकारी थी और वह औषधियों का ज्ञान भी रखते थे| यह लोग नीम, मूंगा, मछली की हड्डियाँ, हिरण के सींग, आदी से विभिन्न प्रकार के रोगों का उपचार करते थे।

हड़प्पा सभ्यता का आर्थिक जीवन-

सिंधु सभ्यता का आर्थिक जीवन कृषि, पशुपालन तथा विभिन्न प्रकार के उद्योग धंधों एवं व्यापार वाणिज्य पर आश्रित था| इस सभ्यता के आर्थिक जीवन की विशेषताएं निम्नलिखित थी-

कृषि- सिंधु वासियों का मुख्य पेशा कृषि कार्य था| हड़प्पा कालीन अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण स्थान इसी कारण हड़प्पाकालीन लोगों का आर्थिक जीवन संपन्न तथा वैभवपूर्ण था। यहां के लोग प्रमुख रूप से गेहूं, जौ, बाजरा, की खेती करते थे| धान की खेती के साक्ष्य भी लोथल से मिले हैं| कालीबंगा से एक जुते हुए खेत का भी प्रमाण मिला है| कपास की खेती सर्वप्रथम हड़प्पा वासियों ने की थी। सिंचाई के कृत्रिम साधन मौजूद होने के कारण कृषि उत्पादन बहुत अच्छा हुआ करता था, अनाजों को रखने के लिए अन्नागार ( अनाज को सुरक्षित रखने वाला स्थान) भी प्राप्त हुआ है| अच्छी कृषि ने इस सभ्यता में व्यापार एवं वाणिज्य को बहुत बढ़ावा दिया था|

पशुपालन- हड़प्पावासी पशुपालन भी किया करते थे । इस सभ्यता की खुदाई ने कई प्रकार की मुहरों, दीवारों पर प्राप्त पशुओं की आकृतियों एवं जीवाश्मों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कृषि के साथ-साथ इस सभ्यता में पशुपालन भी पर्याप्त रूप से विकसित था| इस सभ्यता के लोग गाय , भैंस , बैल, भेड़ , सूअर , कुत्ता, बकरी आदि पशुओं का पालन किया करते थे। पशुओं से दूध, मांस, ऊन आदि वस्तुएं प्राप्त होती थी, इसके अतिरिक्त पशुओं का प्रयोग परिवहन के साधनों के रूप में भी किया जाता था|

उद्योग धंधे– हड़प्पा सभ्यता में वस्त्र बुनाना आभूषण बनाना और मिट्टी के बर्तन बनाना आदि उद्योग धंधे विकसित थे। मिट्टी के बर्तन लाल रंग से रंगे होते थे , कुछ बर्तनों पर काले रंग की चित्रकारी भी की गई हैं।

व्यापार- सिंधु सभ्यता के निवासियों ने विभिन्न प्रकार के उद्योग धंधों का भी विकास किया| हड़प्पा सभ्यता में व्यापार उन्नत अवस्था में होने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार भी था। इस सभ्यता में व्यापार के दो प्रकार मिलते हैं- आंतरिक व्यापार एवं बाह्य व्यापार| सभ्यता में मिले हुए अवशेषों से यह विदित होता है कि उस समय भी विदेशों से व्यापार होता था, तथा व्यापार जल एवं थल दोनों मार्गों से होता था। इस सभ्यता के व्यापारी नीलगिरी एवं मैसूर के क्षेत्रों से सोना तथा रत्न प्राप्त करते थे, तथा तांबा राजस्थान से मंगवाया जाता था| विभिन्न प्रकार के खिलौने मूर्तियां आदि स्थानीय व्यापार की प्रमुख विशेषताएं थी| उस समय के लोगों ने वस्तुओं को तौलने के लिए तराजू एवं बातों का प्रयोग करना सीख लिया था|

कुटीर उद्योग- हड़प्पावासी छोटे छोटे व्यवसायों में निपुण थे, उस समय के लोग कांसा ,पीतल आज धातु का प्रयोग करना जानते थे, इसके अतिरिक्त उस समय के लोग मिट्टी के बर्तन, वस्त्र बनाना, खिलौने बनाना, ईट बनाना, रुई कातना , मकान बनाना, आभूषण आदि बनाने में निपुण थे|

सिंधु सभ्यता का धार्मिक जीवन-

शिव की पूजा- हड़प्पावासी मूर्ति पूजक थे। मोहनजोदड़ो की खुदाई से एक पशुपति शिव की मूर्ति मिली है, जो सिंधु सभ्यता में शिव पूजा को प्रमाणित करती है| इस मूर्ति के दाएं और चीता एवं हाथी तथा बाई तरफ गैडा और भैंसा उत्कीर्ण है। आसन के नीचे दो हिरण बैठे हुए हैं सिर पर त्रिशूल जैसा आभूषण है इससे पशुपति शिव की पूजा के प्रचलन का पता चलता है।यहां से प्राप्त कई अन्य मुहरों में भी शिव भगवान को नागधारी, धनुर्धर के रूप में चित्रित किया गया है, शिव के यह सारे रूप वर्तमान समय में भी प्रचलित हैं|

मृत्युशक्ति की पूजा- इस सभ्यता के लोग नृत्य सत्य में भी विश्वास करते थे| इस सभ्यता की खुदाई में स्त्रियों की जो भी मूर्तियां प्राप्त हुई हैं उन्हें सर जॉन मार्शल ने मृत्यु देवी के नाम से संबोधित किया है|

लिंग और योनि पूजा- सिंधु घाटी सभ्यता में लिंग व योनि पूजा की जाती थी। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सिंधुवासी प्राकृतिक की प्रजनन शक्ति की उपासना करते होंगे| लिंग एवं योनि के द्वारा इस सभ्यता के लोग ईश्वर की सृजन शक्ति के प्रति अपनी भक्ति भावना प्रकट करते थे| शिवलिंग की पूजा हिंदू धर्म की पूजा पद्धति की ओर संकेत देती है।

पशु पूजा- खुदाई में प्राप्त हुई मूर्तियों वक ताबीजों पर अंकित पशुओं के चित्रों से पता चलता है कि हड़प्पावासी पशुओं की भी पूजा करते थे। सिंधु सभ्यता के निवासी पशु एवं शर्तें की पूजा करते थे, उनकी पूजा किसी डर अथवा देवताओं का वाहन मानकर किया जाता था| पशुओं में कूबड़ वाला बैल सबसे प्रमुखता जिसके कई सारे चित्र मुहरों पर मिलते हैं| मोहनजोदड़ो की एक मुद्रा पर देवता के दोनों और सर्प की आकृति बनी हुई है जो नाग पूजा की पुष्टि करती है| इनके अतिरिक्त बिल्ली, चीता आदि की भी पूजा की जाती थी।

अग्नि एवं प्रतीक पूजा- लोथल एवं कालीबंगा से अग्नि देवियों के साक्ष्य मिले हैं जो अग्नि पूजा को प्रमाणित करता है इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य के चित्र भी कई मुद्दों पर प्राप्त हुए हैं जो संभवत किसी देवता के प्रतीक के रूप में पूजे जाते रहे होंगे|

जल पूजा- सिंधु सभ्यता में स्नान को धार्मिक अनुष्ठान का दर्जा प्राप्त था| मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल स्नानागार इसी उद्देश्य से बनाया गया था|

अंधविश्वास- हड़प्पावासी अंधविश्वास व जादू -टोनो पर भी विश्वास रखते थे। इस सभ्यता की खुदाई में कई प्रकार की ताबीज, माला प्राप्त हुए हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं|हड़प्पा निवासियों को पुनर्जन्म में विश्वास था और वह अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए नृत्य एवं संगीत के कार्यक्रम करते थे| देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बलि प्रदान करना, मरणोपरांत जीवन में विश्वास इस सभ्यता के लोगों में था|

मृतक संस्कार- हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त हुए अस्थि-पंजर तथा अस्थियों व भस्मों के कलशो से यह अनुमान लगाया जाता है कि हड़प्पावासी निम्न तीन विधियों द्वारा मृतक का अंतिम संस्कार करते थे-

  • मृतक को जमीन में दफनाया जाता था।
  • मृतक को जंगल में पशु पक्षियों के भोजन हेतु खुला छोड़ दिया जाता था।
  • मृतक को जलाकर उसकी हड्डियां व राख को एक घड़े में रखकर जमीन में दफनाया जाता था।

सिंधु सभ्यता का राजनीतिक जीवन

साक्ष्यों के अभाव में सिंधु घाटी सभ्यता की राजनीतिक स्थिति का निर्धारण करना अत्यंत कठिन है| इस सभ्यता में किसी भी शासक या राजा के होने का कोई ठोस प्रमाण मौजूद नहीं है| कुछ विद्वानों के मत अनुसार इस सभ्यता में पुरोहित वर्ग का शासन हुआ करता था|योजनाबद्ध निर्माण को देखते हुए केवल यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नगरपालिका जैसी कोई संस्था इस सभ्यता में कार्यरत थी। साक्ष्यों के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि इस सभ्यता के लोग प्रायः शांतिप्रिय थे और उनका जीवन राजनीतिक दृष्टि से भी शांतिपूर्ण था|

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