रज़िया सुल्तान का इतिहास

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रज़िया सुल्तान का इतिहास

Brief history of Razia Sultan in Hindi-
रजिया सुल्तान एकमात्र मुस्लिम स्त्री थी जो दिल्ली की राजगद्दी पर बैठी थी| रजिया ने केवल साढ़े तीन साल ही राज्य कार्य किया था परंतु निसंदेह वह एक अत्यंत सफल तथा असाधारण शासिका थी| रजिया सुल्तान इल्तुतमिश की पुत्री थी और वह पहली महिला शासिका थी|

Razia Sultan History in Hindi-

पूरा नामजलॉलात उद-दिन रज़ियॉ
जन्म1205 ईसवी
जन्मस्थानबदायूँ
राज तिलक10 नवंबर 1236 ईसवी
पिता का नामइल्तुतमिश
माता  का नामकुतुब बेगम
पति का नाम मलिक अल्तुनिया
मृत्यु 13* अक्टूबर 1240 ईसवी
मृत्यु स्थान कैथल, हरियाणा

* कुछ इतिहासकारों के मतानुसार रजिया की मृत्यु 14 अक्टूबर 1240 ईसवी को हुई थी|

एक कुशल शासक रजिया सुल्तान ने अपने क्षेत्र में पूर्ण कानून और व्यवस्था की स्थापना की थी| उसने अपने शासनकाल में व्यापार को बढ़ावा दिया इसके अतिरिक्त उसने सड़कों का निर्माण, कुओं को खुदवाया, और स्कूलों तथा पुस्तकालयों का निर्माण करके देश के बुनियादी ढांचे में सुधार करने की कोशिश की। उसने कला और संस्कृति के क्षेत्र में भी योगदान दिया और कवि, चित्रकारों और संगीतकारों को प्रोत्साहित किया।

Razia Sultan History in Hindi Language

More History of Razia Sultan in Hindi Language-

रजिया जब दिल्ली के राज सिंहासन पर विराजमान हुई तब उसे दिल्ली की जनता तथा अमीरों का समर्थन प्राप्त था, परंतु मुल्तान, बदायूं, लाहौर आदि स्थानों के सूबेदार रजिया सुल्तान के विरोधी थे| रुकनुद्दीन फिरोजशाह के कत्ल के बाद उसका वजीर इन सूबेदारों के साथ सम्मिलित हो गया और रजिया के खिलाफ कई षड्यंत्र रचे जाने लगे| षडयंत्रकारियों के पास एक बहुत बड़ा सैन्य बल था और उन्होंने रजिया की राजधानी को घेर लिया| रजिया इस बात को जानती थी कि वह षडयंत्रकारियों का सामना नहीं कर सकती अतः उसने कूटनीति का सहारा लिया और सुबेदारों में फूट डाल दी| रजिया की इस चाल से सूबेदारों में परस्पर विरोध उत्पन्न हो गया और भी आपस में ही लड़ने लगे, जिससे उनका गुट पूरी तरह से बिखर गया| जब सूबेदारों का गुट बिखर गया तब रजिया ने उन पर आक्रमण कर दिया और दो सूबेदारों का कत्ल कर दिया गया| फिरोज का वजीर वहां से प्राण बचा कर भागा परंतु सिरमूर की पहाड़ियों में उसकी भी मृत्यु हो गई|
सूबेदारों पर प्राप्त विजय सिंह रजिया की स्थिति में काफी सुधार हुआ| इस जीत के पश्चात रजिया की प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई और उसने राज्य के उच्च पदों का पुनः वितरण किया| रजिया ने ख्वाजा महाजबुद्दीन को अपना वजीर नियुक्त किया| उसने अपने राज्य के सूबेदारों के पद पर भी नए व्यक्तियों की नियुक्ति की| एक बार फिर से बंगाल दिल्ली सल्तनत के अंतर्गत आ गया| रजिया का शासन क्षेत्र लगभग भारत के कई हिस्सों में फैल गया| रजिया सुल्तान को जमालुद्दीन याकूत नाम के एक अफसर से प्रेम था, याकूत घोड़ों का अफसर (अमीर-आखुर)के पद पर आसीन था| रजिया सुल्तान पुरुषों के वस्त्र पहनती थी, घुड़सवारी करती थी तथा खुले दरबार में राज कार्य करती थी इस बात से कई मुसलमान उससे अप्रसन्न रहते थे|

रजिया की मृत्यु कैसे हुई?-

Razia Death History in Hindi Language- रजिया की सफलताएं ही उसके पतन का कारण बनी, उसकी सफलताओं ने उससे एक निरंकुश शासिका बनने की ओर प्रेरित किया| जब रजिया निरंकुश शासिका बनने की ओर अग्रसर हुई तब तुर्की अमीरों ने उसको रोकने का प्रयास किया| तुर्की अमीरों के पास उनकी अपनी एक सैन्य शक्ति थी|
रजिया के विरुद्ध कई षड्यंत्र आरंभ हो गए, इन षड्यंत्रों में उसके दरबार और प्रांत के कई अमीर व्यक्ति शामिल थे| वह लोग रजिया को राजगद्दी से हटाना चाहते थे| षडयंत्रकारियों का प्रमुख नेता इख्तियार उद्दीन आयतीन था, इसके अतिरिक्त लाहौर का सूबेदार कबीर खान तथा भटिंडा का शासक मलिक अल्तुनिया भी उसके खिलाफ षड्यंत्र कर रहे थे| षडयंत्रकारियों को यह मालूम था कि वह रजिया के गढ़ में उसको मात नहीं दे सकते और उसकी पराजय उसके क्षेत्र के बाहर ही संभव है अतः उन्होंने ऐसी योजना बनाई जिससे रजिया को बाहर निकाला जा सके| इस योजना के अनुसार 1240 ईसवी में कबीर खान ने लाहौर में विद्रोह कर दिया| इस विद्रोह का दमन करने रजिया शीघ्र ही लाहौर पहुंची और रजिया ने कबीर खान को पराजित कर दिया| कबीर ने हथियार डाल कर भागने की कोशिश की परंतु वह कामयाब ना हो सका और अंततः उसने रजिया के सामने आत्मसमर्पण कर दिया| इस जीत के बाद रजिया पुनः राजधानी लौट आई और राजधानी लौटने के 15 दिन के भीतर ही दोबारा विद्रोह हुआ| इस बार भटिंडा के सूबेदार अल्तुनिया ने विद्रोह को प्रारंभ किया था, और इस बार रजिया षड्यंत्रकारियों के बिछाए जाल से अपने आप को नहीं बचा पाई| जैसे ही रजिया भटिंडा पहुंची तो रजिया के सबसे विश्वासपात्र और प्रेमी याकूत को गोली मार दी गई| याकूत की मृत्यु के बाद रजिया को भी पकड़ लिया गया और उसे अप्रैल 1240 ईसवी में जेल में डाल दिया गया| रजिया को जेल में डालने के बाद इल्तुतमिश के पुत्र बहराम को गद्दी पर बिठाया गया, जिस समय बहराम को राजगद्दी पर बिठाया गया उस समय अल्तुनिया को उसकी इच्छा अनुसार पद नहीं प्राप्त हुआ जिससे वह असंतुष्ट हो गया| उसने अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए अगस्त 1240 ईसवी में भटिंडा कि जेल से रजिया को मुक्त करा लिया और उससे विवाह कर लिया| अल्तुनिया और रजिया पुनः दिल्ली पर अधिकार करने के लिए निकले पर वह बहराम की सेना द्वारा पराजित हो गए| पराजित होने के बाद उनके सैनिकों ने उनका साथ छोड़ दिया और वह दोनों भटिंडा की ओर वापस लौटने के लिए बाध्य हो गए, अंततः 13 अक्टूबर 1240 को डाकुओं ने कैथल के पास उन दोनों का वध कर दिया| रजिया की मृत्यु के पूर्णतया दोषी उसके राज्य के अमीर व्यक्ति थे क्योंकि वह लोग स्त्री होने के कारण रजिया को पसंद नहीं करते थे|


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