Rahim Das ke Dohe in Hindi रहीम के दोहे

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Rahim Das ke Dohe in Hindi रहीम के दोहे

वैसे तो हिंदी साहित्य में रहीम दास जी ने अनेकों दोहे रचित किए हैं, और उनके हर दोहे का वर्णन यहां पर कर पाना कठिन है, इसीलिए हमने रहीम दास जी के कुछ अत्यंत ही महत्वपूर्ण और रोचक दोहे यहां पर अर्थ सहित प्रस्तुत किए हैं|

Rahim Das ke Dohe in Hindi with Meaning-

दोहा :- “जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं. गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं.”
अर्थ :- रहीम दास जी ने इस दोहे में कहा है कि जब हम किसी बड़े को छोटा कहते हैं तो इससे उस का बड़प्पन कम नहीं होता है, जैसा कि हम पर्वत को उठाने वाले गिरधर (कान्हा- कृष्ण जी ) को मुरलीधर, माखनचोर इत्यादि नामों से पुकारते हैं तो इससे उनके मान और महिमा में कोई भी कमी नहीं आती है|

दोहा :- “जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग. चन्दन विष व्यापे नहीं, लिपटे रहत भुजंग.”
अर्थ :- रहीम दास जी ने इस दोहे में उत्तम प्रकृति का एक उदाहरण दिया है और हमें बतलाया है कि यदि आपका आचरण और आप की प्रकृति उत्तम है तो बुरी संगति भी आप का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी, जैसे कि चंदन के पेड़ पर बहुत सारे सर्प लिपटे हुए होते हैं परंतु इससे उसकी सुगंध में तनिक भी परिवर्तन नहीं आता है|

दोहा :- “रहिमन धागा प्रेम का, मत टोरो चटकाय. टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गाँठ परी जाय”
अर्थ :- इस दोहे में रहीम जी ने बताया है की प्रेम रूपी धागा को कभी भी तोड़ना नहीं चाहिए क्योंकि यह कैसा धागा है जो यदि एक बार टूट जाए तो फिर जल्दी जुड़ता नहीं है और यह जुड़ भी गया तो इस में गांठ पड़ जाएगी, अर्थात आपका प्रेम वैसा नहीं रहेगा उसमें कुछ ना कुछ बदलाव जरूर आ जाएंगे|

दोहा :- “दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं. जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के नाहिं”
अर्थ :- इस दोहे में कहा गया है कि कौवा और कोयल एक समान काले रंग के होते हैं और उनमें भेद कर पाना तब तक मुश्किल होता है जब तक कि उनकी आवाज को ना सुना जाए, परंतु जैसे ही बसंत ऋतु आती है और कोयल की मधुर आवाज हमारे कानों में पढ़ती है तो हमें कोयल और कव्वे के बीच अंतर स्पष्ट हो जाता है| इस दोहे का परोक्ष अर्थ यह है कि कौन सा मनुष्य हमारे लिए हितकारी है और कौन सा नहीं, यह अंतर हम तब तक कर सकते हैं जब तक परिस्थितियां हमारे प्रतिकूल ना हो अर्थात हमारी प्रतिकूल परिस्थितियों में जो हमारे अपने हैं वही हमारे साथ होते हैं बाकी साथ छोड़ देते हैं|

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दोहा :- “रहिमन ओछे नरन सो, बैर भली न प्रीत. काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँती विपरीत.”
अर्थ :- इसका अर्थ है कि यदि आपने बुरे लोगों से दोस्ती की है या दुश्मनी की है तो यह दोनों ही परिस्थितियां आपके लिए गंभीर हैं क्योंकि कुत्ता यदि आप को काटता है तब भी वह आपके लिए हानिकारक है और यदि वह आपको चाटता है तब भी वह आपके लिए हानिकारक है|

दोहा :- “रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारी. जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारी.”
अर्थ :- इस दोहे मैं रहीम जी ने छोटे और बड़े के बीच में अंतर स्पष्ट किया है और हमें बतलाया है कि हमें बड़ी वस्तुओं को पाकर छोटी वस्तुओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिए क्योंकि जिस काम के प्रयोग के लिए हमें छोटी सी सुई की आवश्यकता होती है हम उस कार्य को तलवार से नहीं कर सकते हैं|इस दोहे का परोक्ष अर्थ यह है की यदि आपकी दोस्ती या जान पहचान बड़े लोगों से हो गई है तो आपको अपने छोटे दोस्तों का साथ नहीं त्यागना चाहिए|

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दोहा :- “समय पाय फल होता हैं, समय पाय झरी जात. सदा रहे नहीं एक सी, का रहीम पछितात.”
अर्थ :- इस दोहे में रहीम जी ने बताया है किस समय कभी भी एक सा नहीं रहता है और ना ही किसी की अवस्था हमेशा एक जैसी बनी रहती है जैसा की हम सभी जानते हैं किस समय आने पर पेड़ में फल लगते हैं, कुछ समय पश्चात वह फल पककर गिर जाते हैं और कुछ समय पश्चात पतझड़ में उसी पेड़ के सारे पत्ते भी झड़ जाते हैं| अर्थात हमें अपने दुख के समय में अपने धैर्य को बनाए रखना चाहिए और निरंतर अच्छे कार्यों की ओर अग्रसर रहना चाहिए वक्त जरूर बदलेगा|

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दोहा :- “वे रहीम नर धन्य हैं, पर उपकारी अंग. बाँटन वारे को लगे, ज्यो मेहंदी को रंग.”
अर्थ :- रहीमदास जी ने कहा की वे लोग धन्य हैं,जो हमेशा सब पर उपकार करते हैं और हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं जैसा कि हम सभी जानते हैं कि जो व्यक्ति मेहंदी बांटता रहता है उस व्यक्ति के शरीर पर भी मेहंदी का रंग लग ही जाता है अर्थात यदि आप किसी पर उपकार और परोपकार कर रहे हैं तो भगवान आपकी सहायता अवश्य करेगा|

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दोहा :- “रूठे सृजन मनाईये, जो रूठे सौ बार. रहिमन फिरि फिरि पोईए, टूटे मुक्ता हार.”
अर्थ :- इस दोहे का अर्थ है कि यदि कोई सज्जन व्यक्ति या कोई ऐसा करती जिससे आप प्यार करते हैं और वह टूट जाए तो आप उसे एक नहीं सौ बार मनाइए क्योंकि यदि कोई मोतियों की माला टूट जाती है उन मूर्तियों को देखा नहीं जाता है अपितु पूरे इकट्ठा करके फिर से धागे में पिरो दिया जाता है|

दोहा :- “रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय. सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी लैहैं कोय.”
अर्थ :- इस दोहे मैं रहीम दास जी ने लिखा है कि यदि आपके मन में कोई बात दबी हुई है और यह बात ऐसी है जो आप सबके सामने नहीं कर सकते हैं तो उसे अपने ही मन में रखना उचित है क्योंकि लोग उस बात को सुनेंगे और अंदर ही अंदर मजे लेंगे और उस बात को और अधिक लोगों तक फैला देंगे| बहुत कम ही लोग हैं जो आप उस बात को समझेंगे और आपका साथ देंगे|
इस दोहे का एक बहुत अच्छा उदाहरण मुझे याद आ रहा है की यदि आप रास्ते में जा रहे हैं और कोई आपका सामान छीन ले तो आप उसे सबसे मत बताइए ( कुछ अपने लोगों को बताना जरूरी है) क्योंकि वह लोग आगे जाकर यह बोलेंगे की वैसे तो बड़ा बहादुर बना घूमता है और किसी ने इसका सामान मार दिया, और ऐसी ही बातें करके आपके मजे लेंगे|

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