गुर्जर प्रतिहार वंश Gurjar Pratihar Vansh History in Hindi

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गुर्जर प्रतिहार वंश Gurjar Pratihar Vansh History in Hindi

गुर्जर प्रतिहार वंश-

गुर्जर प्रतिहार वंश के विषय में इतिहासकारों में मतभेद है| इस वंश के विषय में शिलालेखों और साहित्य आदि से कुछ जानकारियां प्राप्त हुई हैं जिसके आधार पर अलग-अलग विद्वानों ने अपने अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं|

गुर्जर का अर्थ-

डॉक्टर मजूमदार ने लिखा है कि गुर्जर शब्द से गुर्जर जाति का बोध होता है| इसमें विभिन्न वर्गों के लोग थे और यह शब्द एक जनजातीय समूह का बोधक है जिनमें विभिन्न जातियां थी जैसे कि प्रतिहार, ब्राह्मण, हरिश्चंद्र, उज्जैन तथा कन्नौज का गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक नागभट्ट था|

Gurjar Pratihar Vansh History in Hindi-

इस वंश का नाम गुर्जर प्रतिहार क्यों पड़ा, इस संबंध में एक मत यह भी है कि प्रतिहार का अर्थ होता है- द्वारपाल और प्राचीन काल में लक्ष्मण ने अपने भाई राम की रक्षा करते समय द्वारपाल का काम किया था| इस वंश के राजाओं के अभिलेख में उन्हें लक्ष्मण की संतान बताया गया है जिन्होंने अपने बड़े भाई राम के द्वार पर प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य किया था, किंतु इसके अतिरिक्त कुछ मतों के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों की उत्पत्ति विदेशी जातियों से हुई थी|

प्रतिहार राज्य-

प्रतिहारों का सर्वप्रथम ज्ञात स्थान मध्य राजस्थान में मंदौर था| इसकी एक शाखा ने उज्जैन में एक राज्य की स्थापना की थी और नागभट्ट नामक राजा ने इस वंश की प्रतिष्ठा बढ़ाई थी|

Gurjar Pratihar Vansh History in Hindi

गुर्जर प्रतिहार वंश के शासक-

नागभट्ट प्रथम-
गुर्जर प्रतिहार वंश का पहला प्रमुख शासक नागभट्ट प्रथम था| चालुक्य पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख तथा हर्षचरित में उसका उल्लेख मिलता है| नागभट्ट ने गुर्जरों की विभिन्न शाखाओं को एक सूत्र में बांध कर उनकी स्थिति को मजबूती प्रदान की थी और उसने मालवा के क्षेत्र पर अपना अधिकार कर लिया था| कुछ विद्वानों के अनुसार नागभट्ट ने अरबों को परास्त किया तथा अपनी सीमा का विस्तार गुजरात तक किया था|

वत्सराज-
प्रतिहार वंश का दूसरा सबसे प्रभावशाली शासक वत्सराज था| उसका शासन क्षेत्र राजस्थान के मध्य भाग तथा उत्तर भारत के पूर्वी भाग तक था| उस के समय में ही कन्नौज के स्वामित्व के लिए त्रिदलीय संघर्ष प्रारंभ हुआ था| वत्सराज ने पाल शासक धर्मपाल को युद्ध में परास्त किया था परंतु जिस समय वह बंगाल से वापस आ रहा था उसी समय राष्ट्रकूट शासक ध्रुव ने उसे पराजित कर मारवाड़ की तरफ भागने को मजबूर कर दिया| वत्सराज की इस पराजय से गुर्जरों की बढ़ती शक्ति पर अंकुश लग गया था|

नागभट्ट द्वितीय-
वत्सराज की हार के बाद गुर्जरों की शक्ति प्रयोग अंकुश लगा था उसे नागभट्ट द्वितीय ने पुनः बढ़ाया, इसके साथ ही साथ नागभट्ट द्वितीय ने गुर्जरों की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया| नागभट्ट द्वितीय ने आंध्र, सिंधु, विदर्भ तथा कलिंग को पराजित किया और आयुधवंशी शासक चक्रयुध को गद्दी से हटा दिया और अपनी सत्ता स्थापित की| जब चक्रयुध को गद्दी से हटा दिया गया तो नागभट्ट द्वितीय और धर्मपाल का युद्ध होना अनिवार्य हो गया था| मुंगेर के पास हुए युद्ध में नागभट्ट ने धर्मपाल की सेना को पराजित कर दिया परंतु इस कार्य के पश्चात भी कन्नौज पर उसका स्थाई आधिपत्य स्थापित नहीं हो पाया था| चक्रयुध और धर्मपाल ने राष्ट्रकूटों से मैत्री कर ली और राष्ट्रकूट शासक गोविंद तृतीय को कन्नौज पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया| 810 ईसवी में गोविंद तृतीय ने नागभट्ट द्वितीय को पराजित किया और मालवा तथा गुजरात पर अपना अधिकार कर लिया|

मिहिरभोज-
गुर्जर प्रतिहार वंश का सर्वश्रेष्ठ शासक मिहिर भोज था| मिहिर भोज को भोज प्रथम के नाम से भी जाना जाता है| मिहिरभोज के पिता का नाम रामभद्र था और उसने अपने पिता की हत्या करके राजगद्दी प्राप्त की थी| मिहिरभोज ने गुर्जरों की शक्ति पराकाष्ठा पर पहुंचा दी थी| मिहिरभोज ने पाल शासक देवपाल तथा विग्रह पाल (नारायणपाल) मिहिरभोज के हाथों पराजित हुए थे और पाल राज्य के पश्चिमी भाग पर उसका अधिकार हो गया| भोज ने राष्ट्रकूट शासक कृष्ण द्वितीय को परास्त कर उत्तरी भारत का स्वामित्व प्राप्त किया था| मिहिरभोज ने कन्नौज में अपनी राजधानी स्थापित की थी और उससे भयभीत होकर कलचुरियों, चंदेलों और प्रभु ने भी उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी|

महेंद्रपाल प्रथम-
महेंद्रपाल प्रथम में अपने पिता से विरासत में प्राप्त साम्राज्य की रक्षा की| उस के समय में कश्मीर के शासक शंकरवर्मन ने पश्चिमी पंजाब के कुछ भागों पर अधिकार कर अपने एक अधिकारी को सौंप दिया परंतु महेंद्र पाल ने मगध और उत्तरी बंगाल के क्षेत्र को अपने अंतर्गत कर लिया| इतिहासकारों के मतानुसार महेंद्र पाल का राज्य हिमालय से विंध्याचल और पूर्वी समुद्र तट से पश्चिमी समुद्र तट तक फैला हुआ था| महेंद्र पाल के दरबारी कवि का नाम राजशेखर था| राजशेखर में कर्पूरमंजरी, काव्यमीमांसा, बाल रामायण और बाल भारत, भुवनकोष, हरविलास की रचना की थी|

महिपाल प्रथम-
महिपाल गुर्जर प्रतिहार वंश का अंतिम प्रभावशाली शासक था| महिपाल का राज्यकाल बहुत ही कठिनाइयों से भरा हुआ था| यद्यपि महिपाल ने दोआब क्षेत्र, बनारस, ग्वालियर और काठियावाड़ पर अधिकार किया था परंतु उसके समय से गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी|

गुर्जर प्रतिहार वंश का पतन-

महिपाल की मृत्यु के बाद गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य का विघटन प्रारंभ हो गया था| इस विघटन का प्रमुख कारण यह था कि राजगद्दी पर कुछ अयोग्य शासक आसीन हो गए थे और इसी बात का लाभ उठाकर राष्ट्रकूटों एवं पालों ने पुनः आक्रमण कर दिया| आक्रमणों से गुर्जरों को बहुत नुकसान हुआ और गुर्जर प्रतिहार राज्य के विभिन्न भागों पर इन संस्थाओं का अधिकार हो गया| राजपाल, जोकि गुर्जर वंश का एक राजा था, उसके समय तक गुर्जरों की शक्ति कन्नौज के आसपास तक ही सिमट कर रह गई थी और जब महमूद गजनबी ने कन्नौज पर आक्रमण किया और उसे लूटा तक राजपाल कन्नौज छोड़कर भाग खड़ा हुआ था| उसने गंगा पार करके बारी मैं अपनी राजधानी स्थापित की थी| उसके कायरतापूर्ण कार्य को देखकर चंदेलों के शासक गंगा देव ने उसकी हत्या कर त्रिलोचन पाल को राजा बनाया परंतु त्रिलोचन पाल केवल नाम मात्र का शासक था| गुर्जर प्रतिहार वंश का अंतिम शासक यशपाल था|

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