Bairam Khan history in Hindi

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Bairam Khan history in Hindi

हुमायूं की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य का लगभग समस्त प्रधान अधिकार बैरम खां के हाथों में आ गया और उसने बिना किसी विरोध के और सबके सहयोग के साथ वकील सल्तनत (जिसे हम प्रधानमंत्री के नाम से जानते हैं) का पद ग्रहण कर लिया था| बैरम खां बड़ा ही योग्य और अनुभवी व्यक्ति था और उसने अपनी योग्यता एवं कुशल राज्य सञ्चालन के बल से ही राज्य में उच्च पद पर पहुंचा था| उसने अनेकों संकटों के समय में अपनी राष्ट्रभक्ति का परिचय दिया था और हुमायूं की ऐसी भक्ति तथा विश्वास पात्रता के साथ सेवा की थी जिसकी प्रशंसा शेरशाह तक ने की थी| इतिहास इस शिया वकील सल्तनत की विद्या प्रेम, ईमानदारी, और धार्मिकता की प्रशंसा करता है और उसके पतन पर खेद प्रकट करता है, परंतु यहाँ ये बात जान लेना भी आवश्यक है कि उसने अपनी शक्ति का दुरूपयोग भी किया, अगर उसे किसी भी व्यक्ति पर अपना शत्रु होने का संदेह हो जाता था तो उनके साथ वह बड़ी ही क्रूर नीति का प्रयोग करता था, उसे छोटी से छोटी बातों में अपने विरुद्ध भयंकर षडयंत्र की गंध मिलती थी, और इन कारणों से राज्य के कई बहुत से लोग उसके विरुद्ध हो गए थे| अबुल फजल ने बैरम खान की सम्राट अकबर तथा दूसरे सरदारों से विरोध होने के कारणों का उल्लेख किया है| बैरम खान ने शेख गदाई को सदर सदूर के पद पर नियुक्त किया|

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बैरम खां के पतन में उस समय के कुछ ऐसे लोगों का हाथ था जोकि अकबर के बहुत करीब थे| उसके विरुद्ध एक षड्यंत्र की रचना हुई जिसमें राजमाता हमीदा बानू बेगम, अकबर की धाय माँ महामंगा, उसके पुत्र आदम खान और उसके संबंधी दिल्ली के सूबेदार शहाबुद्दीन का प्रधान भाग था| उस समय बैरम खां के विरुद्ध इस षड्यंत्र की योजना बादशाह को वियाना में समझा दी गई, जहां वह शिकार के बहाने गया था| बैरम खान को जल्द ही इस षडयंत्र का पता अपने शुभचिंतकों एवं सहयोगियों से चल गया और उसने बादशाह अकबर के प्रति अपनी नम्रता, राष्ट्रभक्ति एवं अधीनता प्रकट की परंतु तब तक बादशाह अकबर ने उसकी अप्रिय एवं क्रूर हुकूमत का अंत कर देने का दृढ निश्चय कर लिया था| उस समय बैरम खान के कुछ मित्रों ने हमला करके अकबर को बंदी बना लेने की राय दी परंतु उसने ऐसा कार्य करके अपनी सेवा एवं राजभक्ति को कलंकित करना स्वीकार नहीं किया| अकबर ने उसे सन्देश भेजा की मैंने शासन की बागडोर स्वयं अपने हाथों में लेने का निश्चय कर लिया है तथा अब शाशन का सारा कार्यभार मैं खुद ही सम्भालूंगा और मेरी इच्छा है कि आप हज करने के लिए मक्का चले जाएं, इसके अतिरिक्त बादशाह ने बैरम खान के भरण पोषण के लिए एक जागीर भी दी, जिसकी आय उसके अपने नियुक्त किए हुए आदमियों द्वारा बैरम खां पास भेजने का प्रबंध भी कर दिया|

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बैरम खान ने इस राजाज्ञा को शांतिपूर्वक स्वीकार किया और मक्का की यात्रा की तैयारी की| जब वह अप्रैल 1560 ईस्वी में वियाने की ओर बढ़ा तो उसका विरोधी दल बहुत ही भयभीत हो गया कि कहीं वह विद्रोह न कर दें, और इसी दल की राय से अकबर ने पीर मोहम्मद नाम के एक अफसर को, जो पहले बैरम खां के अधीन रह चुका था, उसे जल्दी मक्का रवाना कर देने के लिए भेजा| इस अपमान से बैरम खां बहुत ही चिढ गया और उसने विद्रोह करने का निश्चय कर लिया| वह पंजाब की ओर बढ़ा और तबरहिंदा के किले में अपना परिवार और संपत्ति रखकर आगे बढ़ा| अकबर ने उसके दमन के लिए अपने सेनापतियों को भेजा जिनसे जालंधर के निकट हारकर वह शिवालिक पहाड़ी में शरण लेने के लिए बाध्य हुआ, बादशाह अकबर स्वयं पंजाब की ओर बढ़ा और उसने पीछा किया अंततः विवश होकर बैरम खान ने अधीनता को स्वीकार किया और क्षमा प्रार्थना की| अकबर ने, जो उसकी सेवाओं का मूल्य भली-भांति जानता था, उसे शीघ्र ही क्षमा कर दिया| बैरम खान सम्मान के साथ मक्का की ओर चला गया और बादशाह दिल्ली लौट आया|

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बैरम खान राजपूताना होता हुआ पाटन गुजरात पहुंचा, वहां के सूबेदार ने उसका अच्छी तरह से स्वागत किया वह पाटन में कुछ दिनों तक ठहरा| जहां से आगे बढ़ना उसके भाग्य में नहीं था, एक अफगान ने जनवरी सन 1561 ईस्वी में उसकी हत्या कर दी, जिसका पिता मुगलों के साथ युद्ध में मारा गया था| बैरम खान के खेमे को डाकुओं ने लूट लिया लेकिन उसका पुत्र अब्दुर्रहीम जो उस समय मात्र 4 वर्ष का बालक था उनके हाथों से बचा लिया गया और दिल्ली दरबार में भेज दिया गया| समय आने पर उसकी प्रतिभा का विकास हुआ और उसने अपनी योग्यता से बड़ी उन्नति की और साम्राज्य की सेवाओं के उपलक्ष्य में खानखाना की उपाधि प्राप्त की जिसे हम अब्दुर्रहीम खानखाना ( रहीम दास जी ) के नाम से जानते हैं|

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