Asahyog Andolan | Non-Cooperation Movement in Hindi

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Asahyog Andolan | Non-Cooperation Movement in Hindi

History of Asahyog Andolan in Hindi-

सन 1920 ईस्वी भारतीय जनता के लिए बहुत ही निराशा का वर्ष था| जब प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था तब भारतीय जनता ब्रिटिश हुकूमत से उम्मीद लगाए बैठी थी कि वह भारतीय जनता के विकास में अब कुछ सहयोग करेंगे परंतु रौलट एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड एवं पंजाब में मार्शल लॉ में उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया| जलियांवाला बाग हत्याकांड एवं रौलट एक्ट से भारतीय जनता समझ गई थी कि ब्रिटिश हुकूमत भारतीयों के प्रति नरमी नहीं बरतेगी और वह सिर्फ उनका दमन ही करेगी| ब्रिटिश शासन ने कई दमनकारी नीतियां अपनाई और इन दमनकारी नीतियों के विरोध में सितंबर 1920 ईस्वी में असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम पर विचार करने के लिए कोलकाता में कांग्रेस का एक विशेष अधिवेशन बुलाया गया| इसी अधिवेशन में महात्मा गांधी ने असहयोग का प्रस्ताव पेश किया था| असहयोग आन्दोलन का संचालन स्वराज की माँग को लेकर किया गया था| इसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग न करके उनकी कार्यवाही और उनके व्यापार में बाधा उत्पन्न करना था। गांधी जी ने 1 अगस्त, 1920 को असहयोग आन्दोलन आरम्भ किया। कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की थी| इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार भारत में विदेशी शासन के विरुद्ध सीधी कार्यवाही करने का निर्णय लिया और यह सुनिश्चित किया की वे विधान परिषदों का बहिष्कार करेनेग तथा असहयोग व सविनय अवज्ञा आन्दोलन का आरम्भ करेंगे| प्रारंभ में सुरेंद्रनाथ बनर्जी, चितरंजन दास, महामना मदन मोहन मालवीय, शंकर नायर, बिपिन चंद्र पाल, मोहम्मद अली जिन्ना आदि ने इसका विरोध किया परंतु अली बंधुओं एवं मोतीलाल नेहरू के समर्थन से यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया|
श्रीमती एनी बेसेंट ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया था और उन्होंने इस प्रस्ताव के संबंध में कहा था कि यह भारतीय स्वतंत्रता के लिए बड़ा धक्का है, इस प्रस्ताव से समाज और सभ्य जीवन के बीच संघर्ष छिड़ सकता है|

असहयोग आंदोलन का स्वरूप-

महात्मा गांधी अंग्रेजों की दमनकारी नीति से बहुत दुखी हो उठे थे क्योंकि उस समय अंग्रेजों ने भारतीयों के प्रति बहुत ही कठोरता बढ़ती और बहुत सारी दमनकारी नीतियां बनाई जिससे सामान्य जन बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ| इन दमनकारी नीतियों के फलस्वरुप महात्मा गांधी ने अगस्त 1920 ईस्वी को एक अहिंसात्मक असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया| उन्होंने भारतीयों से यह विनती की कि वह अंग्रेजों द्वारा दी गई सभी उपाधियों एवं सरकारी पदों को त्याग कर दें| इसके साथ ही साथ उन्होंने भारतीय जनमानस से कहा कि वे अपने बच्चों को अंग्रेजी विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए ना भेजें| उन्होंने भारतीय जनता से कहा कि अंग्रेजी संस्थाओं की सदस्यता का त्याग करें और विदेशी वस्तुओं तथा न्यायालयों का बहिष्कार करें| गांधी जी के इन विचारों का बहुत ही गहरा प्रभाव भारतीय जनता पर पड़ा और असहयोग आंदोलन का अच्छा परिणाम निकला| गांधी जी के आह्वान पर हजारों की संख्या में विद्यार्थियों ने विद्यालयों का परित्याग कर दिया और कई राष्ट्रीय विद्यापीठ की स्थापना की गई| लोग विदेशों में बने हुए कपड़ों का त्याग करके खद्दर एवं स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग अपने दैनिक जीवन में करने लगे| उन्होंने विदेशों से आने वाले विभिन्न वस्तुओं का भी परित्याग कर दिया जिससे ब्रिटिश हुकूमत की आर्थिक व्यवस्था पर बहुत ही गहरा घाव लगा| असहयोग आंदोलन में भारतीय जनता में स्वराज के प्रति एक नई चेतना का संचार किया|

असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम-

असहयोग आंदोलन में गांधीजी ने सरकारी पदों,विदेशी वस्तुओं एवं उपाधियों का बहिष्कार करने के लिए कहा और उन्होंने इसके लिए एक रूपरेखा भी प्रस्तुत की| इस रूपरेखा के अंतर्गत 1 करोड़ रुपए का तिलक फंड स्थापित करना था| इसके अतिरिक्त एक करोड़ स्वयंसेवकों की भी भर्ती करना उनका लक्ष्य था| उन्होंने 20 लाख चरणों का वितरण करने का सुझाव दिया तथा राष्ट्रीय शिक्षा की दिशा में भी उन्होंने कई प्रयास किए| उन्होंने ब्रिटिश न्यायालयों का बहिष्कार करने के लिए कहा और भारत में लोक अदालतों की स्थापना करने पर जोर दिया|

असहयोग आंदोलन के प्रमुख कारण क्या थे?

असहयोग आंदोलन के प्रमुख कारण-

☑ सन 1920 ईस्वी में कांग्रेस ने नागपुर अधिवेशन में असहयोग आंदोलन चलाने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे-
☑ ब्रिटिश सरकार ने भारतीय जनमानस का किसी भी क्षेत्र में सहयोग करना बंद कर दिया था जिस वजह से असहयोग आंदोलन का होना सुनिश्चित हो गया था|
☑ सरकार के कार्यों को बंद करना|
☑ प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार ने कोई भी काम नहीं किया|
☑ असहयोग आंदोलन के होने में भुखमरी एवं गरीबी प्रमुख है| 1913 से 1918 के बीच में सभी वस्तुओं के दाम लगभग 2 गुना हो गए जिससे भुखमरी एवं गरीबी अपने चरम पर पहुंच गई|
☑ जब देश में गरीबी एवं भुखमरी अपने चरम पर थी तब महामारी के कारण देश में लाखों लोगों की जानें गई और इस क्षेत्र में ब्रिटिश हुकूमत ने कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं किया जिसने भारतीय जनता को काफी क्रोधित किया और उन्होंने असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर अपनी हिस्सेदारी निभाई|

असहयोग आंदोलन के परिणाम-

महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के परिणाम अग्रलिखित हैं-

☑ असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर लगभग दो तिहाई मतदाताओं ने विधानमंडल के चुनाव का बहिष्कार कर दिया, और इन मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग नहीं किया|
☑ अध्यापकों एवं विद्यार्थियों ने अंग्रेजी स्कूलों में जाना छोड़ दिया|
☑ कई भारतीय जो कि ब्रिटिश सरकार की सरकारी सेवाओं में कार्यरत थे उन्होंने अपनी सेवा से त्यागपत्र दे दिया और असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने|
☑ जनता में ब्रिटिश हुकूमत के प्रति बहुत ज्यादा रोष था और उन्होंने विदेशी वस्तु की जगह जगह पर होली जलाई|
☑ जिस समय असहयोग आंदोलन हो रहा था उस समय ब्रिटेन के राजकुमार प्रिंस ऑफ वेल्स का 17 नवम्बर 1921 को भारत में आगमन हुआ और उनके आगमन पर उनका स्वागत हड़तालों एवं प्रदर्शनों से किया गया|
☑ यह आंदोलन स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अंग बन गया और आगे चलकर इस आंदोलन में भारतीय स्वतंत्रता में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई|

महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस क्यों ले लिया?

असहयोग आंदोलन बहुत ही तीव्रता से भारत के जनमानस तक पहुंच रहा था और लाखों करोड़ों की जनसंख्या में लोग इस से जुड़ रहे थे यह आंदोलन लगभग 2 वर्षों तक बहुत ही सफलतापूर्वक चलता रहा और इस आंदोलन से ब्रिटिश हुकूमत की जड़े हिल गई थी| इस आंदोलन को कुचलने के बहुत सारे प्रयास ब्रिटिश हुकूमत द्वारा किए गए परंतु उन्हें सफलता ना मिली और यह दिनोंदिन आगे बढ़ता जा रहा था| जब ब्रिटिश हुकूमत के सारे हथकंडे विफल हो गए तो उन्होंने कांग्रेस के कुछ सक्रिय नेताओं के साथ-साथ महात्मा गांधी को भी जेल में डाल दिया| महात्मा गांधी उस समय भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में सबसे अग्रणी थे और जब उन्हें जेल में डाल दिया गया तब जनता ने विरोध में आंदोलन किया| 5 फरवरी 1922 ईस्वी को जनता का आंदोलन अहिंसक ना होकर हिंसा में बदल गया और जनता ने देवरिया ज़िले के चौरीचौरा नामक स्थान पर एक पुलिस चौकी में आग लगा दी| इस आग से 22 पुलिसकर्मियों को अपनी जान गवानी पड़ी| इस बात से महात्मा गांधी बहुत ही दुखी हुए और उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया| गांधी जी ने 12 फ़रवरी, 1922 को बारदोली में हुई कांग्रेस की बैठक में इस आन्दोलन को समाप्त करने के अपने निर्णय के बारे में ‘यंग इण्डिया’ में लिखा था कि, “आन्दोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर एक अपमान, हर एक यातनापूर्ण बहिष्कार, यहाँ तक की मौत भी सहने को तैयार हूँ।”

असहयोग आन्दोलन को वापस लेने पर मोतीलाल नेहरू ने कहा कि, “यदि कन्याकुमारी के एक गाँव ने अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सज़ा हिमालय के एक गाँव को क्यों मिलनी चाहिए।”

असहयोग आन्दोलन को स्थगित करने पर सुभाष चन्द्र बोस ने कहा, “ठीक इस समय, जबकि जनता का उत्साह अपने चरमोत्कर्ष पर था, वापस लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं”।

इस आन्दोलन को स्थगित करने का सीधा प्रभाव गांधी जी की लोकप्रियता पर पड़ा। महात्मा गाँधी को 13 मार्च, 1922 को गिरफ़्तार किया गया तथा न्यायाधीश ब्रूम फ़ील्ड ने गांधी जी को असंतोष भड़काने के अपराध में 6 वर्ष की क़ैद की सज़ा सुनाई। बाद में स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से गाँधी जी को 5 फ़रवरी, 1924 को रिहा कर दिया गया।

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