The History of India in Hindi भारत का इतिहास

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The History of India in Hindi भारत का इतिहास

किसी भी राष्ट्र के विकास और उसके विकसित होने की प्रक्रिया को समझने के लिए हमे सबसे पहले उस देश के अतीत को समझना चाहिए और उसकी व्याख्या एवं समीक्षा करनी चाहिए| भारत का इतिहास विश्व के सभी राष्ट्रों के इतिहास मे प्रमुख स्थान रखता है. भारत के इतिहास के बारे में पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था की “भारत का इतिहास विरोधाभासों से भरा हुआ है किंतु यह मजबूत अदृश्य धागों से बँधा हुआ है”. विद्वानों के मतानुसार भारतीय उपमहाद्वीप का इतिहास लगभग 75000 साल प्राचीन है.

युगों के क्रमों के अनुसार भारत का इतिहास (History of India) अग्रलिखित हैः

प्राचीन भारत का इतिहास
मध्यकालीन भारतीय इतिहास
आधुनिक भारत का इतिहास

प्राचीन भारतीय इतिहास-

Ancient History of India in Hindi- मानव सभ्यता के उदय ( जन्म) से लेकर 10 वीं सदी तक के काल को प्राचीन भारतीय इतिहास का समय कहा जाता है| इस काल की प्रमुख युगों का वर्णन अग्रलिखित है –

पूर्व ऐतिहासिक काल-

इस काल को दो भागों में विभाजित किया गया- पाषाण युग एवं कांस्य युग|
इस युग में हड़प्पा सभ्यता का नाम बहुत उल्लेखनीय है, जिसको कि हम सिंधु घाटी सभ्यता के नाम से भी जानते हैं| सिंधु घाटी सभ्यता के प्रथम अवशेष हड़प्पा नामक स्थान पर प्राप्त हुए थे और इसके आरंभिक स्थल सिंधु नदी के किनारे स्थित है, इस वजह से इस सभ्यता को हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता कहा गया| सिंधु घाटी सभ्यता का काल 2500 से 1750 ईसा पूर्व माना जाता है; इस सभ्यता के अवशेष सर्वप्रथम रायबहादुर दयाराम साहनी ने सन 1921 में हड़प्पा नामक स्थान पर प्राप्त किए थे|

वैदिक सभ्यता-

1560 पूर्व से लेकर 600 ईसा पूर्व तक के कालखंड को वैदिक सभ्यता का काल कहा जाता है, इस सभ्यता का विकास ग्रामीण अर्थव्यवस्था के आधार पर हुआ था| ईरान की धार्मिक पुस्तक “जेन्द अवेस्ता” में इस बात का उल्लेख है कि आर्य ईरान के रास्ते भारत आए थे| भारत पर आक्रमण करने वालों में आर्य सबसे पहले थे| आर्यों ने गंगा के मैदानी इलाकों में वैदिक सभ्यता का बहुत प्रचार एवं प्रसार किया।

बौद्ध और जैन धर्म-

जैन एवं बौद्ध धर्म ने भारतीय समाज एवं जनमानस को बहुत अधिक प्रभावित किया|
बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध का जन्म 563 ईसा पूर्व में हुआ था| इनका जन्म नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के समीप लुंबिनी नामक ग्राम में क्षत्रिय कुल में हुआ था|
महावीर स्वामी को जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक माना जाता है और वह जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे| इनका जन्म वैशाली के निकट कुंडल ग्राम में 599 ईसापूर्व में हुआ था|

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16 महाजनपद
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में सोलह महाजनपदों का उदय हुआ था इन महाजनपदों में से 14 राज्यों का स्वरूप राजतंत्रात्मक एवं दो राज्यों का स्वरूप गणतंत्रात्मक था| महाजनपदों में मगध महाजनपद सबसे शक्तिशाली था|

यूनानी तथा फ़ारसी आक्रमण-

प्राचीन काल के भारतीय इतिहास में भारतीय राज्य पूरी तरह से संगठित नहीं थे जिसका लाभ उठाकर कई यूनानी एवं फारसी शक्तियों ने भारत पर आक्रमण किए जिनमें सिकंदर का नाम उल्लेखनीय है|

सिकंदर-

सिकंदर मकदूनिया के राजा फिलिप का पुत्र था और उसने 326 ईसा पूर्व में भारत पर आक्रमण किया था| पंजाब के राजा पोरस ने सिकंदर के विरुद्ध झेलम नदी के किनारे हाईडेस्पीज का युद्ध लड़ा था परंतु इस युद्ध में पोरस की पराजय हुई थी| कालांतर में सिकंदर भारत को छोड़ कर बेबीलोन चला गया था जहां 323 ईसा पूर्व में उसकी मृत्यु हो गई|

मौर्य वंश-

चाणक्य की सहायता से चंद्रगुप्त मौर्य ने अंतिम नंदवंशीय शासक धनानंद को पराजित किया और 322 ईसा पूर्व में मगध के सिंहासन पर विराजमान हुआ| जिस समय चंद्रगुप्त मौर्य मगध के सिंहासन पर बैठा उस समय उसकी आयु केवल 25 वर्ष की थी| चंद्रगुप्त मौर्य ने यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को युद्ध में पराजित किया था| बिंदुसार चंद्रगुप्त मौर्य का पुत्र एवं महान सम्राट अशोक का पिता था|

शुंग वंश-

वृहद्रथ अंतिम मौर्य शासक था और उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसकी हत्या करके 18460 पूर्व में शुंग वंश की स्थापना की| भागवत धर्म का उदय सिंह काल में ही हुआ था, इसके अतिरिक्त इस काल में वासुदेव विष्णु की उपासना प्रारंभ हुई थी|

कण्व वंश-

शुंग वंश के बाद जिस वंश का आरंभ होता है उसका नाम कण्व वंश है| कण्व वंश का प्रारंभ वासुदेव ने 75 ईसापूर्व में किया था| वासुदेव ने शुंग वंश के अंतिम शासक देवभूति की हत्या की और तत्पश्चात कण्व वंश वंश को प्रसारित किया| इस वंश के अंतिम शासक का नाम सुशर्मा था|

सातवाहन वंश-

सातवाहन वंश की स्थापना सिमुक ने की थी, उसने कड़वा वंश के अंतिम शासक सुशर्मा को राज गद्दी से हटाया था| सातवाहन वंश के काल में कहां से एवं तांबे के साथ-साथ शीशे के सिक्के का काफी प्रचलन हुआ| सातवाहन राजा हाल की जीवनी का नाम गाथासप्तशई है, और यह इसी काल में लिखी गई|
सातवाहन वंश का सर्वाधिक महान शासक गौतमीपुत्र शातकर्णि था|

यवन वंश-

सातवाहन वंश के उपरांत यवन वंश का आरंभ होता है| यवन वंश के डेमेट्रियस प्रथम को भारतीय सीमा में सर्वप्रथम प्रवेश करने का श्रेय दिया जाता है| यवन शासको में सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रसिद्ध शासक मिलिंद था| इतिहासकारों के मतानुसार मिलिंद के साथ प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागसेन का वाद विवाद हुआ था, इस वाद विवाद का विस्तृत वर्णन “मिलिंदपान्हो” में संग्रहीत है| कालांतर में यमन सम्राट मिलिंद ने बौद्ध धर्म को अपना लिया था|

शक वंश-

यवन शासकों के अंत के पश्चात शक वंश का उदय होता है| शक वंश का सबसे प्रसिद्ध शासक रुद्रदामन प्रथम था|

पल्लव वंश –

पल्लव वंश कि शुरुआत पश्चिमोत्तर भारत में शक वंश के अंत होने के पश्चात हुई थी| इस वंश का सबसे प्रतापी शासक गोंडोफर्निश था|

कुषाण वंश-

कुषाण वंश का आरंभ पल्लव वंश के पश्चात हुआ था कनिष्क कुषाण साम्राज्य का शासक 72 ई में बना था| कनिष्क कुषाण वंश के शासकों में सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रतापी शासक था उसने अपने शासनकाल में कश्मीर, गांधार, सिंध, पंजाब आदि कई प्रांतों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया था| कनिष्क ने शक संवत की शुरुआत की थी| कनिष्क के शासन काल में चतुर्थ बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ था| कनिष्क का दरबार इतिहास के कई प्रसिद्ध विद्वानों जैसे कि अश्वघोष, नागार्जुन वसुमित्र से परिपूर्ण था| वात्सायन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कामसूत्र की रचना कनिष्क के ही शासनकाल में की थी|

गुप्त वंश

कुषाण वंश के पश्चात गुप्त वंश का उदय भारतीय इतिहास में हुआ| चंद्रगुप्त प्रथम इस वंश का प्रथम शासक था उसने 319-20 ईस्वी में एक संवत की स्थापना की जिसे गुप्त संवत कहा जाता है| गुप्त वंश नेम कई कुशल योद्धा एवं शासक भारत के इतिहास को प्रदान किया, जिनमें चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय का नाम अग्रणी है| समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त प्रथम का पुत्र था और वह एक महान योद्धा एवं कुशल सेनापति था| समुद्रगुप्त को भारत का नेपोलियन कहा जाता है| समुद्रगुप्त का साम्राज्य विस्तार दक्षिण में नर्मदा, पूर्व में ब्रम्हपुत्र तथा उत्तर में कश्मीर की तलहटी तक विस्तृत था|
चंद्रगुप्त द्वितीय गुप्त वंश के प्रतापी राजाओं में से एक था, उस के शासनकाल में गुप्त साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था| इस काल में सर्वप्रथम रजत मुद्राओं (Silver Coins) का प्रचलन आरंभ हुआ था, इसके साथ ही साथ इस काल को कला एवं साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है|


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